नई दिल्ली।अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की संदिग्ध मौत ने एक बार फिर ये सवाल खड़ा हो गया है कि क्या संतों का मन संपत्ति में लग गया है? महंत नरेंद्र गिरि ने सुसाइड नोट में भी जिस विवाद का जिक्र किया है वो भी फ़िलहाल संपत्ति से जुड़ा ही बताया जा रहा है. यह कोई पहला मामला नहीं है, जब किसी संत ने खुदख़ुशी की हो. अब से पहले भी संपत्ति विवाद को लेकर कई साधु संतों की जान जा चुकी है.

90 के दशक की बात करें तो सन 1991 से एक सनसनी साइ संत के कत्ल की शुरुआत हुई थी. 25 अक्टूबर 1991 को रामायण सत्संग भवन के संत राघवाचार्य आश्रम के बाहर टहल रहे थे तभी स्कूटर सवार लोगों ने उन्हें घेर लिया. उनको गोली मारी गई और फिर चाकू से गोदकर बेरहमी से कत्ल कर दिया गया. क़त्ल ओ गारत का यह सिलसिला यहीं पर नहीं रुका बल्कि 09 दिसम्बर 1993 को रामायण सत्संग भवन के ही संत राघवाचार्य आश्रम के साथी रंगाचार्य की ज्वालापुर में हत्या कर दी गई थी.