बिहार की सियासी बिसात पर वैसे तो सभी ख़ेमों में भितरघाती चालों की सरगर्मियां हैं, लेकिन इसने घाट-घाट का पानी पीये नीतीश कुमार को सबसे ज़्यादा बेबस बना दिया है। बीजेपी ने उनकी दशा ‘पानी में मीन प्यासी’ वाली बना दी है। ऐन चुनावी बेला पर ‘कुर्सी कुमार’ के नाम से धन्य नीतीश बाबू की आंखों में धूल झोंक कर किरकिरी पैदा करने का काम जहां प्रत्यक्ष में ‘मौसम विज्ञानी’ राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी कर रही है, तो परोक्ष रूप से बीजेपी का आला नेतृत्व इसे हवा दे रहा है। सभी नाज़ुक वक़्त का फ़ायदा उठाने की फ़िराक़ में हैं।
बिहार के चुनावी महाभारत में चिराग़ पासवान में उस अर्जुन का चेहरा दिख रहा है जो शिखंडी की तरह बाग़ियों और दलबदलुओं के पीछे छिप कर नीतीश जैसे भीष्म को निपटाने के लिए आतुर है। फ़र्क़ इतना है कि कुरुक्षेत्र में भीष्म ने ख़ुद ही शिखंडी का नुस्ख़ा बताया था, जबकि बिहार में बीजेपी ने इतिहास से सबक सीखने की रणनीति बनाई है। इसी रणनीति के तहत महीनों से अधिक सीटों के नाम पर शुरू हुई खींचतान ने ‘दो-एनडीए’ पैदा कर दिए हैं। दोनों एनडीए असली हैं, क्योंकि दोनों में बीजेपी मौजूद है।
लिहाज़ा, ये चिराग़ का सियासी ढोंग या पैंतरा नहीं तो फिर और क्या है कि हम मोदी के साथ तो हैं, लेकिन मोदी जिसके साथ हैं उसके साथ नहीं हैं। ये फ़रेब नहीं तो फिर और क्या है कि ‘नीतीश की ख़ैर नहीं, मोदी से बैर नहीं’? अकाली, शिवसेना और तेलगुदेशम् ने एनडीए और बीजेपी से नाता तोड़ा तो सत्ता की मलाई खाने के लिए मोदी की गोदी में ही नहीं बैठे रहे, लेकिन पासवान ऐसे नहीं हैं। उन्हें भी नीतीश की तरह जीने के लिए सत्ता की संजीवनी चाहिए ही। नीतीश-पासवान, दोनों ही इस पाखंड की गिरफ़्त में हैं कि उनकी दोस्ती सिर्फ़ बीजेपी से है। हालांकि, राज्यसभा की सीट लेने के लिए पासवान ने थोड़ी देर के लिए नीतीश को दोस्त मानने में ही अपना स्वार्थ देखा।
‘डैमेज कंट्रोल’ के नाम पर कहा गया कि मोदी के नाम पर चिराग़ वोट नहीं मांग सकते। फ़िलहाल, मोदी का ‘कॉपीराइट’ नीतीश के पास है। चिराग़ पर अपनी पार्टी के बैनर-पोस्टर में बीजेपी के नेताओं के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी गई, लेकिन एलजेपी को एनडीए से बाहर नहीं किया गया, क्योंकि चिराग़ जो कुछ भी करते रहे हैं, उसकी रणनीति तो बीजेपी ने ही बनाई है। एकलव्य की तरह चिराग़ भी मोदी को द्रोणाचार्य बता रहे हैं तो बीजेपी कह रही है कि वो गुरु-
यही भंवर फ़िलहाल, बिहार में सियासी बवंडर बना हुआ है। अभी वहां भितरघातियों और दलबदलुओं का बाज़ार उफ़ान पर है। वहां टिकटों के बंटवारे की अंतिम घड़ी तक सभी नेता, पार्टियां और गठबंधन एक-दूसरे को लूटने-ख़सोटने में लगे हैं। राजनीति में इन लुटेरों को बाग़ी भी कहते हैं। आपराधिक छवि या पृष्ठभूमि वाले नेताओं की तरह बाग़ियों की जमात भी हर पार्टी में मौजूद है। सभी ने बग़ावत, दग़ाबाज़ी और भितरघात के संस्कार अपने आला-नेताओं से ही सीखे हैं।