एकनाथ ,,,,तरुण दादा की राह पर,,,,?? 2001 में छ ग में जो हुआ,, क्या वही महाराष्ट्र में होगा??

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सबकी निगाहें इन दिनों महाराष्ट्र के घटनाक्रम पर टिकी हुई है सब यह तो बता रहे हैं कि क्या हो रहा है कोई यह नहीं बता पा रहा कि सस्पेंस से भरे राजनीतिक रस्साकशी का परिणाम किसकी तरफ होगा?? तो आज मैं इसी पर रौशनी डालने की कोशिश करता हूँ,,,,

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महाराष्ट्र में आखिर हो क्या रहा है ??
और होने क्या जा रहा है ??

छत्तीसगढ़ के लोगों को आसानी से समझाने के लिए छत्तीसगढ़ का ही उदाहरण से ही समझिए ,,,, तो आज जो कहानी महाराष्ट्र में हो रही है वैसा कुछ 2001 में cg में देखा गया,,,, उसी घटना के परिणीति आज का ये दल बदल कानून है,,, जिसकी वजह से दलों को तोड़ने की नेताओ की मशक्कत इनदिनों बढ़ी हुई है ,,!!!!!,2001 का वह राजनीतिक घटनाक्रम राजनीति में रुचि रखने वाले सभी को याद होगा ,,,,,जिसमें उस समय के दल बदल कानून को धता बताकर अजीज जोगी ने भाजपा के एक बड़े धड़े को भाजपा से पहले अलग किया फिर एक अलग दल के रूप में मान्यता दिलाई फिर कांग्रेस में विलय कर लिया बस समझ लीजिए यही कुछ होने वाला है महाराष्ट्र में छत्तीसगढ़ के तरुण दादा महाराष्ट्र के एकनाथ मुंडे हैं जिनके साथ विधायकों का एक बड़ा समर्थन हैं और उस समय भाजपा की जो स्थिति इस गढ़ में थी वहीं कुछ स्थिति का सामना इन दिनों उद्धव ठाकरे कर रहे हैं
और उस समय (2001) भाजपा की जो स्थिति छ ग गढ़ में थी वहीं कुछ स्थिति का सामना इन दिनों शिव सेना कर रही है 2000 में मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद कमान लखीराम अग्रवाल वाया ताराचंद साहू थी और भाजपा के विधायकों की संख्या 34 ,, कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत था लेकिन बहुमत के आंकड़े के कोर में कांग्रेस खड़ी थी और रह रह कर विद्याचरण का खतरा अजीत जोगी को डरा रहा था,,,, ऐसे में भाजपा को कमजोर करने के लिए अजीत जोगी ने उस समय के दल बदल कानून के नियम का उल्लंघन किए बिना धीरे-धीरे भाजपा को तोड़ा और किसी को कानों कान खबर नहीं लगने दी,,,,, जब उन विधायकों की संख्या जब 13 हो गई तब इस बात का खुलासा किया गया,, क्योंकि कुल विधायकों की संख्या के एक तिहाई याने 25% विधायकों को अलग गुट और दल के रूप में मान्यता तभी मिल पाती जब ये संख्या उनके पास होती,,, बड़ी चतुराई से भाजपा के इन विधायकों को जोड़ा गया जिसमें बीजेपी से रायपुर कद्दावर विधायक तरुण दादा जो कि अपनी लोकप्रियता के कारण जाने जाते थे उन्होंने अहम भूमिका निभाई ,,, अजीत जोगी ने इस घटना के लिए जो स्क्रिप्ट तैयार की थी हुआ भी वही!!!!,,,,, 13 विधायक अलग हुए विधानसभा अध्यक्ष से अगल दल की मान्यता मांगी जो आसानी से मिल भी गई,,,,
फिर हुआ तो प्लान था उस के मुताबिक,,,13 विधायको ने पहले छ ग विकास कांग्रेस बनाया ,,,और एक दो दिन बाद ही ये दल ने कांग्रेस में विलय कर लिया इसे कांग्रेस विधायकों को संख्या बढ़ गई थी,,,,अजित जोगी का प्लान सफल हो गया था,, 12 भाजपाइयों को तोड़ने वाले तरुण दादा को मंत्री पद मिला दो और साथी मंत्री भी बने,,, इस के साथ कांग्रेस की सत्ता में पकड़ मजबूत हुई , उनके दल में विधायकों की संख्या बढ़ी ,,,,,कुछ ऐसा ही इस समय भाजपा महाराष्ट्र में कर रही है,,,, और इसी तर्ज पर धीरे से दल बदल कानून के 75% विधायकों को संख्या के आंकड़े को जमा किया जा चुका है बड़ी चतुराई से शिव सेना के दूसरे नम्बर के बड़े नेता को तोड़ा गया और अब इस गुट को अलग दल या प्रमुख शिव सेना के रूप में मान्यता दिलाने की तैयारी है इस प्लान का मास्टर माइंड की दो दलों में विवाद की स्थिति में शिव सेना का चुनाव चिन्ह फ्रिज करने की रणनीति होगी ,, हो सकता है बाद में सरकार बना कर या शिव सेना के बड़े गुट का विलय करा दिया जाए,,शिव सेना से अलग हो कर दल की मान्यता के लिए 37 विधायक का अंक जो एकनाथ ने जुटा लिया है
पर उसकी सफलता की राह कुछ विधायकों की सदस्यता रद्द करने का पैंतरा राह में रोड़ा है,,,, पर राजनीतिक पैंतरा और कानून स्वरूप तो वैसा ही एकनाथ ने अपनाया हुआ है जो 2001 में तरुण दादा ने अपनाया और बाद में बड़ा मंत्री पद पाया,,,!!! स्क्रिप्ट पुरानी है लेकिन परिस्थिति नई है और छ ग जैसे छोटे प्रदेश से कई गुना बड़े प्रदेश और हाई प्रोफ़ाइल विधेयको से जुड़े होने के साथ सत्ता पक्ष के विधायको को तोड़े जाने का बड़ा मामला है इस टास्क को पूरा करना मामूली काम नही ऐसे में छ ग की तरह ही सब कुछ हो इसमे संशय है ,,, पर राह वही है उसपर दौड़ने वाली गाड़िया नए मॉडल की है जिनकी रफ़्तार भी तेज है पर परिणाम क्या होगा राम जाने । लेखक मोहन तिवारी आजकल रायपुर रहते हे।