कोरबा में धान खरीदी व्यवस्था चरमराई, लक्ष्य से काफी पीछे जिला

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The Duniyadari : कोरबा, 11 जनवरी। आकांक्षी जिला कोरबा में खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 के अंतर्गत चल रही धान खरीदी व्यवस्था गंभीर अव्यवस्थाओं का सामना कर रही है। हालात ऐसे हैं कि लगभग दो महीने गुजर जाने के बाद भी जिले में तय लक्ष्य का आधा भी धान नहीं खरीदा जा सका है। वहीं, खरीदे गए धान का समय पर उठाव न होने से उपार्जन केंद्रों में करोड़ों रुपये का धान जमा पड़ा है।

इस विपणन वर्ष में कोरबा जिले को 31 लाख 19 हजार क्विंटल धान खरीदी का लक्ष्य दिया गया है। इसके लिए 52 हजार पंजीकृत किसानों के माध्यम से 41 सहकारी समितियों के 65 उपार्जन केंद्रों पर खरीदी होनी है। लेकिन 10 जनवरी तक सिर्फ 27 हजार 216 किसान ही अपना धान बेच पाए हैं। अब तक कुल 16 लाख 45 हजार 565.60 क्विंटल धान की खरीदी हो सकी है, जो लक्ष्य का करीब 53 प्रतिशत ही है। समर्थन मूल्य 2300 रुपये प्रति क्विंटल के अनुसार खरीदे गए धान की कीमत लगभग 390 करोड़ रुपये आंकी गई है।

लक्ष्य पूरा करना बना बड़ी चुनौती

बचे हुए समय में लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रतिदिन औसतन एक लाख 13 हजार क्विंटल से अधिक धान की खरीदी करनी होगी। मौजूदा हालात को देखते हुए यह लक्ष्य बेहद कठिन माना जा रहा है। अभी भी जिले में 24 हजार से अधिक पंजीकृत किसान ऐसे हैं, जो अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

उठाव की रफ्तार सुस्त

धान खरीदी के मुकाबले उठाव की गति भी संतोषजनक नहीं है। अब तक 120 से अधिक राइस मिलरों द्वारा 10 लाख 89 हजार 336 क्विंटल धान का ही उठाव किया गया है, जो कुल खरीदी का लगभग 66 प्रतिशत है। इसके चलते उपार्जन केंद्रों में 5 लाख 54 हजार 816 क्विंटल धान शेष है, जिसकी अनुमानित कीमत 127 करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है। कागजों में भले ही कस्टम मिलिंग के लिए पूर्ण डीओ जारी होने का दावा किया जा रहा हो, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति इससे अलग नजर आ रही है।

पड़ोसी जिलों का दबाव बढ़ा

स्थिति को और जटिल बनाते हुए मार्कफेड ने कोरिया, सरगुजा, बेमेतरा और जीपीएम जैसे पड़ोसी जिलों में खरीदे गए सवा आठ लाख क्विंटल से अधिक धान के कस्टम मिलिंग के लिए कोरबा के राइस मिलरों को ऑनलाइन डीओ जारी कर दिए हैं। इससे जिले की सहकारी समितियों और उपार्जन केंद्रों के कर्मचारियों की चिंताएं और बढ़ गई हैं।

कुल मिलाकर, धान खरीदी और उठाव की धीमी प्रक्रिया ने कोरबा जिले के खरीफ विपणन अभियान पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि जल्द ही व्यवस्थाओं में सुधार नहीं किया गया, तो इसका सीधा असर लक्ष्य पूर्ति के साथ-साथ किसानों और समितियों पर भी पड़ सकता है।