Saturday, March 14, 2026
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नाड़ीवैद्य डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा : देवउठनी एकादशी भगवान विष्णु के जागरण का पर्व, व्रत से मिलता है मोक्ष और सद्बुद्धि का वरदान

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The Duniyadari :कोरबा । “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” के पवित्र मंत्रोच्चार के साथ कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी देवउठनी एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) का शुभ पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं, इसलिए इसे देवोत्थान एकादशी या देवउठनी ग्यारस भी कहा जाता है। नाड़ीवैद्य पंडित डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा के अनुसार, यह पर्व आत्मिक जागरण और शुभ कर्मों की पुनः शुरुआत का प्रतीक है।

इस वर्ष देवउठनी एकादशी व्रत 2 नवंबर 2025, रविवार को मनाया जाएगा। एकादशी तिथि का प्रारंभ 1 नवंबर को प्रातः 9:12 बजे से होगा और समापन 2 नवंबर को प्रातः 7:32 बजे होगा। व्रत पारण 3 नवंबर, सोमवार को प्रातः 6:34 से 8:46 बजे के बीच किया जाएगा।

व्रत का महत्व

डॉ. शर्मा बताते हैं कि देवशयन एकादशी (आषाढ़ शुक्ल एकादशी) से लेकर देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। देवउठनी एकादशी के साथ ही विवाह, गृहप्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है। यह दिन धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना गया है।

✦ व्रत कथा – 1

एक राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे। एक बार एक व्यक्ति ने राजा से नौकरी मांगी, पर एकादशी को अन्न नहीं खाने की शर्त रखी गई। जब व्रत के दिन भूख से व्याकुल होकर उसने भगवान को भोजन के लिए बुलाया, तो भगवान स्वयं प्रकट हुए और उसके साथ भोजन किया। यह देखकर राजा को एहसास हुआ कि सच्ची श्रद्धा से किया गया व्रत ही भगवान को प्रसन्न करता है।

व्रत कथा – 2

दूसरी कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर एक राजा की परीक्षा ली। राजा ने धर्म के प्रति अपनी अटूट निष्ठा दिखाई और अन्न न खाकर व्रत का पालन किया। अंत में भगवान ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए और वरदान दिया कि उसका नाम धर्मनिष्ठ राजाओं में लिया जाएगा।

धार्मिक संदेश

डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा कहते हैं कि देवउठनी एकादशी केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मन और आत्मा को जागृत करने का अवसर है। इस दिन उपवास, कथा श्रवण और भगवान विष्णु की पूजा से मनुष्य के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, शांति और सद्बुद्धि का संचार होता है।

श्रद्धालु इस दिन तुलसी विवाह, दीपदान और दान-पुण्य के कार्य करते हैं तथा भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी से अपने जीवन में सुख, समृद्धि और मोक्ष की कामना करते हैं।