रहमत और सब्र का महीना: रमजान में रोजेदारों के लिए जरूरी एहतियात और अहम बातें

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The Duniyadari: रमजान का पवित्र महीना शुरू होते ही मस्जिदों में रौनक बढ़ गई है और इबादत का खास माहौल नजर आ रहा है। इस महीने को आत्मशुद्धि, सब्र, दान और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान रोजेदार सुबह सूर्योदय से पहले सेहरी कर दिनभर रोजा रखते हैं और सूर्यास्त के बाद इफ्तार करते हैं। रोजा केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि आत्मसंयम, अनुशासन और नेक नीयत का पालन भी जरूरी होता है।

धार्मिक जानकारों के अनुसार रोजे की बुनियाद नीयत पर टिकी होती है। सेहरी के समय रोजे की नीयत की जाती है और दिनभर गलत आचरण से बचना जरूरी होता है। कुछ स्थितियां ऐसी हैं, जिनमें रोजा प्रभावित हो सकता है और बाद में उसकी कजा अदा करनी पड़ती है।

जानबूझकर कुछ खाना या पीना रोजा तोड़ देता है। हालांकि यदि कोई व्यक्ति भूलवश कुछ खा-पी ले, तो रोजा कायम रहता है। इसी तरह बिना इच्छा के उल्टी हो जाने से रोजा नहीं टूटता, लेकिन जानबूझकर उल्टी करने से रोजा अमान्य हो जाता है।

महिलाओं के लिए मासिक धर्म या प्रसव के बाद होने वाला रक्तस्राव शुरू हो जाने पर उस दिन का रोजा मान्य नहीं माना जाता। ऐसी स्थिति में बाद में छूटे हुए रोजों की कजा करना आवश्यक होता है।

धार्मिक दृष्टि से रोजे के दौरान किसी भी तरह की यौन क्रिया या जानबूझकर वीर्यपात रोजे को तोड़ देता है। विद्वानों का कहना है कि रमजान में संयम और आत्मनियंत्रण का विशेष महत्व है, इसलिए ऐसे कार्यों से बचना चाहिए।

इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति रोजा तोड़ने की पक्की नीयत कर ले, भले ही उसने कुछ खाया-पिया न हो, तो नीयत खत्म होने से रोजा मान्य नहीं रहता। इसलिए रोजे की हालत में मन, वचन और कर्म—तीनों पर नियंत्रण आवश्यक है।

रमजान का संदेश यही है कि इंसान अपने व्यवहार में सुधार लाए, जरूरतमंदों की मदद करे और समाज में सौहार्द को बढ़ावा दे। रोजा केवल एक धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आत्मअनुशासन और मानवता का अभ्यास भी है।