आध्यात्मिकता बनाम धार्मिकता : समाज के लिए संतुलन आवश्यक डॉ. सुषमा पाण्डेय, शिक्षाविद् एवं परामर्शदात्री, कोरबा

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The Duniyadari : कोरबा। आज के आधुनिक और भागदौड़ भरे जीवन में आध्यात्मिकता और धार्मिकता को लेकर समाज में व्यापक विमर्श देखने को मिल रहा है। आमजन के बीच यह प्रश्न लगातार उभर रहा है कि क्या केवल धार्मिक होना ही पर्याप्त है या फिर आध्यात्मिक होना अधिक आवश्यक है।

धार्मिकता का संबंध किसी विशेष धर्म की परंपराओं, पूजा-पद्धतियों, नियमों और धार्मिक आयोजनों से जुड़ा होता है। इससे समाज को पहचान, अनुशासन और सांस्कृतिक एकता मिलती है। धार्मिक पर्व और अनुष्ठान सामाजिक मेल-जोल को बढ़ावा देते हैं। हालांकि, जब धार्मिकता में अत्यधिक कर्मकांड और कट्टरता हावी हो जाती है, तो यही समाज में भेदभाव और तनाव का कारण भी बन सकती है।

वहीं, आध्यात्मिकता व्यक्ति के आंतरिक विकास, आत्मचिंतन और चेतना से संबंधित होती है। यह किसी एक धर्म तक सीमित न होकर मानवता, प्रेम, करुणा और शांति का संदेश देती है। आध्यात्मिक सोच अपनाने से व्यक्ति मानसिक रूप से सशक्त बनता है और समाज में सहिष्णुता, सद्भाव और भाईचारे की भावना का विकास होता है।

बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि धार्मिक आचरण में आध्यात्मिक मूल्यों का समावेश किया जाए, तो समाज अधिक शांतिपूर्ण और समरस बन सकता है। वर्तमान समय में, जब समाज तनाव और असहिष्णुता जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब संतुलित धार्मिकता के साथ आध्यात्मिक दृष्टिकोण को अपनाना अत्यंत आवश्यक हो गया है।

धार्मिकता जीवन को दिशा देती है और आध्यात्मिकता उस दिशा को सार्थक बनाती है। दोनों के संतुलन से ही एक स्वस्थ, संवेदनशील और मानवतावादी समाज का निर्माण संभव है। धर्म वही है जो धारण करने योग्य हो और अध्यात्म वही है जो व्यक्ति के भीतर संतुलन और शांति स्थापित करने में सहायक हो।