The Duniyadari : कोरबा, 31 जनवरी। कोरबा विधानसभा क्षेत्र में मतदाता सूची के शुद्धिकरण (SIR) की प्रक्रिया के नाम पर अल्पसंख्यक मतदाताओं को जानबूझकर मताधिकार से वंचित करने की साज़िश रची जा रही है। यह आरोप लगाते हुए पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने इसे लोकतंत्र पर सीधा हमला बताया है। उन्होंने इस गंभीर मामले को लेकर कोरबा कलेक्टर, मुख्य चुनाव आयुक्त (भारत निर्वाचन आयोग) तथा प्रदेश के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।


जयसिंह अग्रवाल ने कहा कि विश्वसनीय तथ्यों और सामने आए दस्तावेज़ों से स्पष्ट है कि फॉर्म-7 का बड़े पैमाने पर फर्जी और आपराधिक दुरुपयोग किया गया है। इसका उद्देश्य एक विशेष अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटवाना है, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 326 का खुला उल्लंघन है।
55 पन्नों की सूची में 1566 नाम, 98% अल्पसंख्यक
सोशल मीडिया पर वायरल लगभग 55 पृष्ठों की एक सूची में 1566 मतदाताओं के नाम विलोपन के लिए चिन्हित किए गए हैं। इनमें से करीब 98 प्रतिशत मतदाता एक ही अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। अग्रवाल ने कहा कि यह आंकड़ा अपने आप में साबित करता है कि यह कोई संयोग नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह से प्रेरित संगठित षड्यंत्र है।
फर्जी आवेदन और पहचान की चोरी का आरोप
मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिन मतदाताओं के नाम और EPIC नंबर से फॉर्म-7 दाखिल किए गए, उन्हें इसकी कोई जानकारी तक नहीं है। उनके नाम का दुरुपयोग करते हुए यह झूठा दर्शाया गया कि वे उस पते पर निवास नहीं करते या स्थायी रूप से अन्यत्र चले गए हैं, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। जयसिंह अग्रवाल ने इसे जालसाजी, कूटरचना, पहचान की चोरी और मताधिकार पर डकैती करार दिया।
पहले भी दी गई थी चेतावनी
उन्होंने याद दिलाया कि छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत पहले ही भारत निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर आगाह कर चुके थे कि एक राजनीतिक दल के निर्देश पर उसके कार्यकर्ता फॉर्म-7 का दुरुपयोग कर रहे हैं। बावजूद इसके, उस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया गया।
स्पष्ट और कड़ी मांगें
जयसिंह अग्रवाल ने मांग की है कि—
- कोरबा विधानसभा क्षेत्र में प्राप्त सभी फॉर्म-7 आवेदनों की 100 प्रतिशत घर-घर जाकर भौतिक व दस्तावेजी जांच कराई जाए।
- यह सार्वजनिक किया जाए कि किस व्यक्ति या संगठन ने, किसके निर्देश पर यह फर्जीवाड़ा किया।
- फर्जी फॉर्म-7 पाए जाने पर IPC, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950/1951 और आईटी अधिनियम के तहत तत्काल एफआईआर दर्ज कर सख्त कार्रवाई हो।
- यदि किसी BLO, सुपरवाइज़र या निर्वाचन कर्मी की भूमिका संदिग्ध पाई जाए तो उसके खिलाफ विभागीय और दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
- जांच पूरी होने तक सभी विवादित विलोपन प्रक्रियाओं पर तत्काल रोक लगाई जाए।
लोकतंत्र और सामाजिक सौहार्द पर खतरा
अग्रवाल ने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाना कोई साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि नागरिक के मूल अधिकार पर सीधा प्रहार है। यदि इस तरह के मामलों में कठोर और उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं हुई तो इससे न केवल निर्वाचन प्रणाली की विश्वसनीयता खत्म होगी, बल्कि सामाजिक सौहार्द और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी गहरी क्षति पहुंचेगी।
उन्होंने जिला निर्वाचन प्रशासन से अपेक्षा नहीं, बल्कि जवाबदेही की मांग करते हुए कहा कि इस पूरे प्रकरण में की गई हर कार्रवाई को पूर्ण पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक किया जाना चाहिए।





























