चौधरी पर भारी न पड़ जाए ,शशिकला का किरदार… रेत से तेल और …प्याऊ पर शरबत,दीवार में छप गया कमल का…

599

0.शशिकला का किरदार निभा रही जिले की एक अधिकारी…

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के बतौर सलाहकार के रूप में काम करने वाली शशिकला को तो आपने पढ़ा ही होगा। उसी तर्ज पर जिला की एक अधिकारी शशिकला का किरदार निभा रहीं हैं। कहने को तो वे एक विभाग की अदना सी अधिकारी है पर उनका रुतबा किसी उच्च अधिकारी से कम नहीं है। तभी तो जिला का कोई भी काम हो मजाल है उनके सहमति के बिना आगे बढ़े। अब और तो और साहब स्वास्थ्य विभाग से लेकर शिक्षा विभाग में होने वाली भर्ती भी उन्हीं की मर्जी से हो रही है। उसके बाद भी उनके काम और नाम का भक्तगण गुण गाते फिर रहे हैं। अब बात आत्मानन्द स्कूल का ही ले लीजिए… स्कूल बिल्डिंग से लेकर तमाम तरह की जिम्मेदारी शिक्षा विभाग की है पर भर्ती करने का नहीं। तभी तो आत्मानन्द स्कूल के लिए शिक्षकों की भर्ती दूसरे विभाग के होनहार अधिकारी को जिम्मा सौंपा गया । मतलब साफ है सबका मालिक एक!

 

0.रेत से तेल और स्कार्पियो…

रेत से तेल निकालने वाले एक वर्दीधारी की चर्चा ट्रांसफर के बाद भी हिलोरे मार रही है। वजह है अचानक हुए स्थांतरण और स्कार्पियों का शौक!! उड़ती खबर की माने तो रेत के अवैध कारोबारियों से इनका गहरा नाता रहा है और वे रेत कारोबारियों का तेल निकालने में उस्ताद हैं। तब और जब खदानें बंद थी और उत्खनन चालू, उस दौरान हर चौक में इंट्री शुल्क लगता था।  अभी भी कमोबेश धंधा अच्छा ही था ,यही वजह है कि साहब ने वाहन खरीद ली।

अब जब उनका स्थांतरण हो गया तो कारोबारियों से कहने लगे हैं कि अब क्या बताए सर मुड़ाते ही ओले पड़ गए खैर जहां ट्रांसफर हुआ है वहां तो विभाग का हर सिपाही भी ड्यूटी करना चाहता है इसलिए इतना भी दुखी होने की जरूरत नही हैं। हां ये बात अलग है बंधा-बंधाया धंधा को छोड़ने का मलाल जरूर रहेगा, लेकिन, जहां भी जाये वहां अपना काम बखूबी (धंधापानी) निभाए वही तो सच्चा सिपाही है।

0.प्याऊ पर शरबत भारी…

प्यास पानी बुझाता है कोकोकोला नहीं..लेकिन यहां पर तो नगर निगम की मदद से चौक-चौक पर संचालित शीतल प्याऊ पर शरबत भारी पड़ रहा है।कहते हैं पूरे मन से आधी रोटी भी ज्यादा है और आधे मन से पूरी रोटी भी आधा। शीतल शरबत का कॉन्सेप्ट नया नहीं है बल्कि कई सालों से जारी है। मन से किये जा रहे इस पुनीत कार्य से ज्येष्ठ के तपती दोपहरी में पानी मिल जाये तो गला तर हो जाता है लेकिन जब प्यासे को पानी की जगह शरबत मिल जाये तो उसकी तृप्ति का आनंद ही अलग है। लेकिन नगर निगम के प्याऊ में प्यासे भी अपना प्यास बुझाना नहीं चाहते। दरअसल निगम के पुराने रिकार्ड को देखकर उनके मन का संशय कि पानी कितना पुराना है, टंकी की सफाई कैसी है? मतलब साफ है दिख रहा है शीतल सरबत के आगे प्याऊ की चमक फीकी पड़ रही है।

0.चौधरी पर भारी न पड़ जाए सियासी चौधराहट

पूर्व IAS और अब बीजेपी नेता ओपी चौधरी की सियासी चौधराहट अब उन्हीं पर भारी पड़ रही है। दरअसल खुलेआम कोयला चोरी का पुराना वीडियो को गेवरा माइन्स का बता कर पोस्ट करने के मामले में सूबे के वर्तमान मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री आमने सामने आ गए हैं। कोयला चोरी का एपिसोड अब पीछे छूट चुका है लेकिन, सियासत गरमा गई है।

मीडिया में बयानों का कोयला धधक रहा है, इसकी आंच बीजेपी नेता को झुलसा रही है। मुख्यमंत्री इस मामले में कुछ कहते उससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डालकर मामले को और हवा दे दी। डॉ रमन ने लिखा है..” ओपी चौधरी ने आपके लचर प्रशासन की खामियां उजागर की तो गैर जमानती धाराएं लगा दीं। हम डरने वाले नहीं हैं। सनद रहे, यह तानाशाही नहीं चलेगी। ईंट से ईंट बजा देंगे कांग्रेस सरकार की।”

वहीं सूबे के मुखिया ने भी रमन सिंह के ट्वीट पर उन्हीं के अंदाज में जवाब दिया है ”जितनी ईंट बजाना है बजा लें, फर्क नहीं पड़ता” फिलहाल तो मुख्यमंत्री दिल्ली में हैं पर उनके लौटने पर ईंट किस पर चलेगी… इस बात की चर्चा जोरो पर है।

वॉल पेंटिंग में भूल दीवार में छप गया कमल का फूल.. इधर भी है भूल

कांग्रेस सरकार में भाजपा चुनाव चिन्ह को भला क्यों सहन  किया जाए!! मगर भूल से फूल में निखार आ जाए हो तो क्या करें… सुधारना तो पड़ेगा क्योंकि सरकार में बैठे जो है। हुआ भी यही पर्यावरण के प्रति जागरूकता का संदेश देती, शहर की सुंदरता में चार चांद लगाने चल रहे वॉल पेंटिंग में चूक हो गई । मामला नगर निगम के समीप की सरकारी दीवार का है। शहर की सूरत चमकाने वाले पेंटरो ने  आकर्षक तालाब की चित्रकारी कर उसमें पानी और उसके ऊपर बतख व तालाब में कमल का फूल उकेरा दिया । जिससे तालाब के ओरिजनल लुक को दर्शाया जा सके, पर हो उल्टा गया कांग्रेस सरकार में कमल का फूल चाहे कंही भी हो कैसे स्वीकार्य हो। हुआ भी यही, नगर सरकार में बैठे नेताओ को भनक लगी तो तत्काल प्रभाव से दीवार में हुए पेंटिंग को फिर से पेंट कर दूसरा लुक दिया। अब भूल तो निहारिका रोड में भी है। पूरा देश सेंसनल दौर से गुजर रहा है और सेंसिटिव चीजें इधर की दीवार में परोस दी गई है। अब इसी को मुद्दा बनाकर कमल वाले कोई बड़ा कमाल कर जाएं तो “नूपुर” की रुनझुन नही छनकेगी नहीं बल्कि बड़ा घंटा बजेगा।

     ✍️  अनिल द्विवेदी, ईश्वर चन्द्रा