काम से बनता है नाम,चौबे गए छब्बे बनने दुबे होकर लौटे…न नियम न कायदा सिर्फ फायदा,छत्तीसगढ़ मॉडल गुजरात मॉडल …कांग्रेस के कार्यक्रम में कैसे मुंह

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चौबे गए छब्बे बनने दुबे होकर लौटे…

सही मानने ने देखा जाए कहावत और मुहावरे की इंसान को उनकी हकीकत का आईना दिखता है। कहावत है कि “ चौबे गये छबे बनने दुबे होकर लौटे या फिर कहिए निकले थे हरि भजन को लोटन लगे कपास“ सरकारी कर्मचारियों ने कभी सोचा भी नहीं था कि यही कहावतें उन पर लागू हो जाएंगी। महंगाई भत्ते और गृह भाड़ा पाने की राह सुलभ तो नहीं हुई उल्टे पांच दिन के वेतन कट गए।
अब हड़ताल की सारा दारोमदार केंद्रीय नेतृत्व पर टिका हुआ है। एक अगस्त से अनिश्चित कालीन हड़ताल पर गए तो खुद की वेतन बनने की राह बंद हो जाएगी। वही काम पर लौट गए तो अप्रत्यक्ष रूप से बिना मांग मनवाये घर लौटने की हार कहलाएगी। खैर लोक तंत्र में अपने बात को रखने का सभी को अधिकार है, लेकिन जिस कदर सारे दफ्तर और स्कूल को बंद कर आंदोलन शुरु हुए उससे पब्लिक भी नाराज है और लोग चौक चौराहों पर तो खुलकर कहने लगे हैं कि काम के तो अलग से… और बिना काम किये…! अब सबकी नजर कर्मचारियो के निर्णय पर टिकी है और कह रहे हैं ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो वक्त ही बताएगा।

न नियम न कायदा सिर्फ फायदा…

आदिवासियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए बने विभाग में न तो न नियम देखा गया और न ही कायदा, देखा गया तो सिर्फ अपना फायदा! ग्रामीण अंचलों को रौशनी से जगमग करने का जो सपना बेचा गया वो करोड़ों नहीं बल्कि… का है। ठीक भी है अधिकारी को जब सपना बेचना आता हो बिना धान का छीलका यानी बदरा भी बिक जाता हैं। जिले में हुआ भी यही।

बंधा बंधाया सरपंचों का प्रस्ताव और नियम कायदा को छोड़ अपना फायदा देखकर सोलर लाइट और हाईमास्ट लाइट की खरीदी बाकायदा जनपदों के माध्यम से किया गया। इसके लिए राजधानी से लेकर शहर और गांव के बिचौलिए सक्रिय रहे और प्लान सफल भी रहा आखिर कर गांव की गलियों में हाईमास्ट लाइट लगाया गया जो अधिकांश जगह बंद पड़े हैं, पर रकम तो निकल ही गई।
पुरानी एक कहावत है जब कद्दू कटेगा तो सब में बटेंगा। यानी कहीं बंधा बंधाया आपसी सेटलमेंट कहीं 10 परसेंट तो कहीं 20 परसेंट! भ्रष्टाचार का कारवां यही नहीं रुका बल्कि, एक सक्रिप्ट लिखी गई जिसमें मोह कम और माया ज्यादा थी। फिर क्या था ग्राम पंचायतों के लिए करोड़ों के इनवर्टर खरीद डाली। अब ग्रामीण अंचल में तो ठीक से लाइट भी नहीं है और वहां के इन्वर्टर का मतलब साफ हैं अपना काम बनता तो….!

काम से बनता है नाम…

कहते हैं काम से पहचान और नाम बनता है। अधिकारियों का तो आना जाना लगा रहता है पर उनके कामां को याद जरूर किया जाता है। नए साहब की युवाओं को लेकर सोच काबिले तारीफ है। तभी तो साहब जहां भी रहे सामाजिक बुराई को खत्म करने और नफरत मिटाने की मुहिम पर काम करते हैं। नशा से मुक्ति मिलेगी तो नफरत में भी आएगी कमी ,कुछ इसी तरह की सोच ले करके पुलिस कप्तान ने नशा मुक्ति की जो मुहिम चलाई है उसका आगामी परिणाम क्या होगा? इस परअभी से कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन, यह प्रयास अभिनंदनीय होगा।

अर्से पहले अमिताभ बच्चन की एक फ़िल्म दीवार आई थी जिसका डायलाग आज भी जनमानस क़े जहन में छाया हुआ है। हम जंहा से खड़े जो जाते है लाइन वही से शुरू हो जाती है। वास्तव में अच्छाई की राह पर कमांडर जहाँ भी खड़े हो जाये तो सुधार की कतार अपने आप बनने लगती है। यंग एंग्री मैन की सोच रखना ही काफी नही बल्कि इसे जमीनी धरातल पर उतारने का जज्बा भी होना चाहिए।
नए साहब ने जिस तरह का संकेत दिया है उससे यो लगता है जिले में अच्छाई की कतार जरूर बनेगी। अब बात अगर कुछ साल पहले की करें तो एसपी कल्लुरी साहब ने जिले को सट्टा मुक्त करने संकल्प लिया और भेष बदकर सटोरियों के बीच पहुँच गये, फिर क्या था सट्टा के दांव लगाने वालों की कमर टूट गई और जिला सट्टा मुक्त हो गया।
ठीक उसी तरह नशीली दवाओं के कारोबार से मुक्ति मिलने के आसार नजर आ रहे हैं । अब कुछ दिन पहले की घटना पर ही नजर डाले तो एक युवक सिर्फ और सिर्फ नशे की लत से मां और बहन को मौत के घाट उतार दिया था। शराब के नशा से खतरनाक है मेडिकल नशा जो इन दिनों युवाओं के सर चढ़कर बोल रहा है। कप्तान के अभियान से समाज मे सुधार की उम्मीद जगी है।

छत्तीसगढ़ मॉडल गुजरात मॉडल

छत्तीसगढ़ में चुनाव के डेढ़ साल बाकी हैं मगर कांग्रेस और प्रमुख विपक्षीदल भाजपा में चुनावी मंथन की होड़ मचने लगी है। प्रदेश में दोनों दलों के राष्ट्रीय नेता पार्टी संगठन में जान फूंकने लगातार दौरा कर रहे हैं। कांग्रेस जहां देश जोड़ों अभियान चलाने की तैयारी रही है तो भाजपा आजादी का अमृत उत्सव मनाकर हर घर तिरंगा अभियान चला कर लोगों तक अपनी पहुंच बनाने में जुट चुकी है। लेकिन, इन अभियानों के शुरु होने से पहले राजधानी में दोनों ही दल पूरे चुनावी मोड में आ चुके हैं।
प्रोफेशनल कांग्रेस में सीएम भूपेश बघेल ने भाजपा के गुजरात मॉडल को लेकर सवालों खड़े किए तो छत्तीसगढ़ मॉडल की जमकर तारीफ की। दिल्ली से आए कांग्रेस के नेता भी उन्हीं के सुर से सुर मिलाते दिखे। वहीं भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने प्रदेश की कांग्रेस सरकार को छत्तीसगढ़ मॉडल को जमकर कोसा……। कुल मिला कर चुनाव से प्रदेश की सियासत से शुरु हुआ छत्तीसगढ़ बनाम गुजरात मॉडल इस बार देश का मुद्दा दिख रहा है। लेकिन, इसमें आम आदमी का मुद्दा पूरी तरह से गायब है।

कांग्रेस के कार्यक्रम में कैसे मुंह दिखाएं बिन बुलाए कांग्रेसी…

तुलसीदास का ये दोहा “ आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह…. तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह।।“ जिले की राजनीति में फिट बैठता दिख रहा है। दरअसल 23 जुलाई को छत्तीसगढ़ के स्वप्न दृष्ट्या कहे जाने वाले स्व बिसाहूदास महंत की पुण्यतिथि कार्यक्रम घण्टाघर मिनीमाता कॉलेज के पास हुआ। इस कार्यक्रम को ऑर्गेनाइज पार्टी के अध्यक्ष कर रहे थे।
चूंकि स्व. बिसाहूदास के पुत्र विधानसभा अध्यक्ष है और बहू एमपी है तो स्वाभाविक ही था कार्यक्रम भव्य होना था। इन सबके बीच ये चर्चा का विषय रहा कि ग्रामीण विधायक कार्यक्रम में नहीं दिखे। मंथन के बाद जो बात निकलकर आई है वो चौकाने वाली है क्योंकि कार्यक्रम में ग्रामीण विधायकों की अनदेखी करते हुए आमंत्रण पत्र में उनका नाम ही नहीं था।
सो कार्यक्रम में शामिल क्यों होते, कहीं कोई बात हो जाती तो “बिन बुलाए मेहमान… आ गए“ सुनकर अपमान ही होता। खैर घटना छोटी जरूर है पर विषय बड़ा… क्योंकि जिस शैली में ग्रामीण विधायक आपसी तालमेल कर शहर की राजनीति को प्रभावित करने का प्रयास कर रहें हैं तो उनके साथ ये तो होना ही था। एक कहावत भी है “आज तुम्हारी कल हमारी आएगी बारी!“ जिस अंदाज में जिले की राजनीति आगे बढ़ रही है उससे तो पार्टी नेताओं में रॉर और तकरार खुलकर समझ में आने लगी है। एक कहावत है “क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को…“ अब यहां हो तो उल्टा ही रहा है।

          ✍️   अनिल द्विवेदी, ईश्वर चन्द्रा