चौबे गए छब्बे बनने दुबे होकर लौटे…
सही मानने ने देखा जाए कहावत और मुहावरे की इंसान को उनकी हकीकत का आईना दिखता है। कहावत है कि “ चौबे गये छबे बनने दुबे होकर लौटे या फिर कहिए निकले थे हरि भजन को लोटन लगे कपास“ सरकारी कर्मचारियों ने कभी सोचा भी नहीं था कि यही कहावतें उन पर लागू हो जाएंगी। महंगाई भत्ते और गृह भाड़ा पाने की राह सुलभ तो नहीं हुई उल्टे पांच दिन के वेतन कट गए।
अब हड़ताल की सारा दारोमदार केंद्रीय नेतृत्व पर टिका हुआ है। एक अगस्त से अनिश्चित कालीन हड़ताल पर गए तो खुद की वेतन बनने की राह बंद हो जाएगी। वही काम पर लौट गए तो अप्रत्यक्ष रूप से बिना मांग मनवाये घर लौटने की हार कहलाएगी। खैर लोक तंत्र में अपने बात को रखने का सभी को अधिकार है, लेकिन जिस कदर सारे दफ्तर और स्कूल को बंद कर आंदोलन शुरु हुए उससे पब्लिक भी नाराज है और लोग चौक चौराहों पर तो खुलकर कहने लगे हैं कि काम के तो अलग से… और बिना काम किये…! अब सबकी नजर कर्मचारियो के निर्णय पर टिकी है और कह रहे हैं ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो वक्त ही बताएगा।
न नियम न कायदा सिर्फ फायदा…
आदिवासियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए बने विभाग में न तो न नियम देखा गया और न ही कायदा, देखा गया तो सिर्फ अपना फायदा! ग्रामीण अंचलों को रौशनी से जगमग करने का जो सपना बेचा गया वो करोड़ों नहीं बल्कि… का है। ठीक भी है अधिकारी को जब सपना बेचना आता हो बिना धान का छीलका यानी बदरा भी बिक जाता हैं। जिले में हुआ भी यही।
बंधा बंधाया सरपंचों का प्रस्ताव और नियम कायदा को छोड़ अपना फायदा देखकर सोलर लाइट और हाईमास्ट लाइट की खरीदी बाकायदा जनपदों के माध्यम से किया गया। इसके लिए राजधानी से लेकर शहर और गांव के बिचौलिए सक्रिय रहे और प्लान सफल भी रहा आखिर कर गांव की गलियों में हाईमास्ट लाइट लगाया गया जो अधिकांश जगह बंद पड़े हैं, पर रकम तो निकल ही गई।
पुरानी एक कहावत है जब कद्दू कटेगा तो सब में बटेंगा। यानी कहीं बंधा बंधाया आपसी सेटलमेंट कहीं 10 परसेंट तो कहीं 20 परसेंट! भ्रष्टाचार का कारवां यही नहीं रुका बल्कि, एक सक्रिप्ट लिखी गई जिसमें मोह कम और माया ज्यादा थी। फिर क्या था ग्राम पंचायतों के लिए करोड़ों के इनवर्टर खरीद डाली। अब ग्रामीण अंचल में तो ठीक से लाइट भी नहीं है और वहां के इन्वर्टर का मतलब साफ हैं अपना काम बनता तो….!
काम से बनता है नाम…
कहते हैं काम से पहचान और नाम बनता है। अधिकारियों का तो आना जाना लगा रहता है पर उनके कामां को याद जरूर किया जाता है। नए साहब की युवाओं को लेकर सोच काबिले तारीफ है। तभी तो साहब जहां भी रहे सामाजिक बुराई को खत्म करने और नफरत मिटाने की मुहिम पर काम करते हैं। नशा से मुक्ति मिलेगी तो नफरत में भी आएगी कमी ,कुछ इसी तरह की सोच ले करके पुलिस कप्तान ने नशा मुक्ति की जो मुहिम चलाई है उसका आगामी परिणाम क्या होगा? इस परअभी से कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन, यह प्रयास अभिनंदनीय होगा।































