उधार के इंजीनियर की बाजीगरी
हार के जीतने वाले को बाजीगर तो कहते हैं , पर यहां उधार के इंजीनियर की बाजीगरी की चर्चा ज्यादा… मामला नगर निगम के तेज तर्रार और कम दिन में ज्यादा कमाने की चाह रखने वाले उप अभियंता का है, जो नियम विरूद्ध ट्राइबल में अटैच होकर बड़े ठाठ से निर्माण कार्यों की वाट लगा रहा है।
हालिया मामला 28 करोड़ के टेण्डर का है। जिसमें नियमों को ताक पर रखकर कंडिका 19 जोड़कर कमाल की बाजीगरी की गई है। खबरीलाल की माने तो यह कंडिका इसलिए जोड़ा गया क्योंकि निगम के कुछ ठेकेदारों को ओबलाइज करना था। सो ट्रायबल के ऊ साई राम को सेटिंग कर दिन में तारे दिखाने का सपना दिखाया गया और फिर शुरू हुआ टेण्डर सेटिंग का खेल !
मार्केट में उड़ रही खबर की माने विभाग के निर्माण शाखा के बाबू की बाबूगिरी भी फिर चमक रही है। उसने तो टेण्डर खुलने से पहले ठेकेदारों को काम बाँट दिया है। अब ये सब उसी बिल्डिंग में हो रहा है जहां बार बार बैठक लेकर नियम की दुहाई दी जाती है। अब देखना है कि उधार के इंजीनियर की बाजीगरी कुछ करतब दिखा पाती है या खुद जनाब ट्राइबल से आउट हो जाते हैं।
0.थानेदारी छोड़ गाड़ियों की गिनती कर रहे थानेदार
कोयलांचल के एक थानेदार इन दिनों अपने कारनामे को लेकर सुर्खियां बटोर रहे हैं। दरअसल ये थानेदार थानेदारी छोड़ ट्रांसपोर्टरों की गाड़ियों की गिनती में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। वैसे कहा तो यह भी जा रहा है कि एक कंपनी के यार्ड में खड़ी गाड़ियों को स्क्रेप बनाकर बेचने में उनका बड़ा योगदान है।करें भी क्यों न आखिर पुलिस पब्लिक के सहयोग के लिए ही काम कर रही है। तभी तो अचानक बंद हुए कारोबार के बाद यार्ड में खड़ी गाडियों से ही आमदनी का जरिया ढूंढ निकाला।
वैसे जुगाड़ भी गजब की चीज है अच्छे अच्छों का जमीर हिल जाता है। थाना क्षेत्र में चलने वाली गाड़ी गिनने को फार्मूले की बात करें तो काले हीरे की धरती में ट्रांसपोर्ट के काम का बड़ा क्रेज है। स्वाभाविक है गाड़ियों की गिनती में टैक्स तो मिलता ही होगा। यही वजह है साहब को थानेदारी से ज्यादा फिल्ड के गाड़ियों और मालिकों में अधिक दिलचस्पी है।
खैर कोयलांचल क्षेत्र में कई कारोबार की ट्रांसपोर्टिंग चल रही है। जिसकी वजह से कई कारोबारी थानेदारों से तालमेल बैठाकर कारोबार कर रहे हैं। सही भी है कौन झंझट में फंसे…इससे अच्छा है मिलकर चले और साथ मे सबके साथ सबका विकास का नारा को चरितार्थ करें।
0.इन्हें भी है सम्मान की आस…
कोटवारों के सम्मान के बाद अब सामाजिक वर्करों के सम्मान की बात उठ रही है। सामाजिक स्वास्थ्य वर्करों की बात जायज भी है। मोहल्ले में जब किसी को चिकित्सा सेवा की जरूरत महसूस होती है तो उनकी याद लोगों को जरूर आती हैं। कोरोना काल में तो कोरोना वारियर्स की भूमिका में मुस्तैद होकर मैदानी एरिया में डटे रहे और कोरोना को हराना है….की तख्ती भी लेकर कदम ताल करते रहे। कोरोना तो लगभग हार ही गया मगर ये सामाजिक स्वास्थ्य वर्कर सम्मान पाने की लड़ाई में खुद हार गए।
उन्होंने चिकित्सा विभाग का डोर टू डोर सर्वे हो या घरों में दवा का वितरण सबमें अच्छा प्रदर्शन कर दिखा दिया कि हम किसी से कम नहीं। अब समाज के ऐसे वर्करों को सम्मान नहीं मिलना है तो गंभीर मसला, पर इनकी सुनने वाला कोई नहीं है। खबरीलाल की माने तो इनका सम्मान करें भी कौन क्योंकि खाकी को तो चिकित्सा सेवा वाले सामाजिक वर्करों में दिलचस्पी है नहीं। बाउजूद इसके सामाजिक वर्करों को सम्मान की आस है और कह रहे है कोई तो हमारी पीड़ा समझे और हमारा सम्मान…।
आम आदमी की एंट्री ने बढ़ाया नेताओं की धड़कन…
हाल में पंजाब फतह के बाद आम आदमी पार्टी कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है। पार्टी के पक्ष में बने माहौल को भुनाने देश के छोटे राज्यों पर आप की नजर है। यही वजह है कि आप ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में एंट्री कर नेताओं की धड़कन बढ़ा दी है। पार्टी आलाकमान रूठे छूटे और मालदार नेताओं को साधने में लगी है।
अब ऊर्जानगरी की बात करें तो सत्ता पक्ष के एक से बढ़कर दिग्गज नेताओं का गढ़ में सेंध मारने की जुगत में लगे हैं। पार्टी सदस्यता अभियान के बहाने सड़कों पर लगे फ्लेक्स टांगकर शक्ति प्रदर्शन कर बता दिया हम किसी से कम नहीं। पार्टी के नेताओं के आत्मविश्वास को देखकर ऐसा लग रहा है कि चुनाव जीतने की तैयारी की जा रही है। हालांकि राजनीतिक पंडितों की माने तो आम आदमी का प्रदेश में सरकार बनाने का सपना अभी कोसों दूर है। पर हां पार्टी के प्रत्याशी किस पार्टी के वोटरो पर सेंध लगाएंगे इस पर सभी की नजर है। युवाओं का आम आदमी में जुड़ाव से नेताओं की धड़कन जरूर तेज हो गई है।
खैरागढ़ में सबकी खैर…..
खैरागढ़ में पिछले 20 दिनों से जारी चुनावी शोर रामनवमीं के दिन थम गया। खैरागढ़ में जीत किसे मिलेगी और कौन हारेगा ये एक दिन बाद 12 अप्रैल को जनता तय कर देगी पर इसकेे बाद जो परिणाम आएंगे उसे सोच सोचकर कई नेता और मंत्री अपनी खैर मनाने में लगे हैं। ऐसी इसलिए कि चाहे कांग्रेस जीते या बीजेपी जो जीता उसकी खैर… बाकी का भगवान (आलाकमान) जानें।
खैरागढ़ उप चुनाव को सही मायने में 2023 का टेलर माना जा रहा है। खैरागढ़ में कोरबा विधायक और प्रदेश सरकार के मंत्री जय सिंह अग्रवाल की भी परीक्षा है, जिन्हें सीएम के करीबी भिलाई विधायक देवेंद्र यादव के साथ शहर की जिम्मेदारी दी गई है। सेक्टरवार बात करें तो छुईखदान में गिरीश देवांगन, गंडई में मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह, साल्हेवारा कवासी लखमा और विक्रम मंडावी के साथ बृहस्पत सिंह, डॉ. के के ध्रुव और विनोद तिवारी दिन रात एक कर रहे हैं। मंत्री गुरु रुद्र कुमार और डॉ. शिव डहरिया को खैरागढ़, छुईखदान से लेकर गंडई तक के सतनामी बहुल इलाकों की विशेष जिम्मेदारी मिली थी। जहां इन्हें पार्टी को बढ़त दिलाने की जिम्मेदारी दी गई है। अगर ये सफल रहे तो सबकी खैर नहीं तो भगवान मालिक।
भाजपा के जिन नेताओं की साख यहां दांव पर लगी है उनमें पूर्व सीएम रमन सिंह, बृजमोहन अग्रवाल, केदारनाथ गुप्ता
राजेश मूणत, नारायण चंदेल, अनुराग सिंहदेव, धरमलाल कौशिक, भूपेंद्र सवन्नी, मोतीराम चंद्रवंशी, शिवरतन शर्मा, संजय श्रीवास्तव, केदार कश्यप, किरण देव और विजय शर्मा जैसे बड़े चेहरे शामिल हैं। और तो और केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल और पड़ोसी राज्य के ‘मामा’ शिवराज सिंह भी यहां ‘कका’ के खिलाफ ताल ठोंक चुके हैं।
जानकार बताते हैं कि खैरागढ़ के बहाने भाजपा अपने कार्यकर्ताओं और कोर वोट बैंक को रिचार्ज करने का मौका मान रही है, तो जीत हार किसी की भी हो पर इसके परिणाम 2023 के चुनाव के एग्जिट पोल ही माने जाएंगे। तब तक के लिए इंतजार करें।
आखिर में कबीरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर…..ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर….
अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा































