The Duniyadari: दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया कि किसी मौजूदा जज के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सार्वजनिक आरोप लगाना गंभीर मामला है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
अदालत ने वकील नीलेश ओझा की याचिका खारिज करते हुए मुंबई हाई कोर्ट द्वारा शुरू की गई अवमानना कार्रवाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
दरअसल, यह मामला दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियान की मौत से जुड़ा है। दिशा सालियान के पिता ने उनकी मौत की नए सिरे से जांच की मांग करते हुए हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
इस मामले की सुनवाई से पहले 1 अप्रैल को ओझा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उस न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, जिनके सामने मामला सूचीबद्ध होना था।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया को बदनाम करने या सनसनीखेज बनाने का कोई भी प्रयास न्यायपालिका की नींव को कमजोर करता है।
अदालत ने हाई कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें स्वतः संज्ञान लेते हुए ओझा के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता संवैधानिक व्यवस्था का मूल और अपरिवर्तनीय हिस्सा है।
अदालत ने यह भी कहा कि बार का सदस्य होने के नाते वकील से पेशे की गरिमा बनाए रखने और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करने की अपेक्षा की जाती है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस कर लंबित मामले पर आरोप लगाना न केवल अनुशासन के विपरीत है, बल्कि यह पेशेवर और नैतिक जिम्मेदारियों से भी परे है।
पीठ ने हाई कोर्ट से मामले की जल्द सुनवाई कर स्वतंत्र रूप से सभी पहलुओं पर निर्णय लेने का अनुरोध भी किया।















