The Duniyadari: कोरबा- ऊर्जाधानी कोरबा के दर्री स्थित HTPS (हसदेव ताप विद्युत गृह) और DSPM (डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ताप विद्युत गृह) एक बार फिर विवादों के घेरे में हैं। इस बार मामला राख परिवहन और डंपिंग में कथित बड़े खेल का सामने आया है, जिसने विभागीय कार्यप्रणाली और ठेकेदारों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शनिवार को पर्यावरण विभाग की कार्रवाई के दौरान दो ट्रेलरों को रिसदा राखड़ डैम के पास पकड़ा गया, जहां कथित तौर पर नियमों के विरुद्ध राख डंप की जा रही थी।

सूत्रों के अनुसार, यह पूरा खेल लंबे समय से अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से संचालित हो रहा था। कागजों में राख को कटघोरा क्षेत्र की ओर भेजा जाना दर्शाया गया.
लेकिन वास्तविकता में उसे बालको क्षेत्र स्थित रिसदा राखड़ डैम में खपाया जा रहा था। बताया जा रहा है कि बंद पड़े राखड़ डैम में फिलिंग के नाम पर अनुमति लेने का प्रयास किया गया ताकि कुछ चुनिंदा ठेकेदारों को लाभ पहुंचाया जा सके।

इस पूरे मामले में हेम्स कॉरपोरेशन का नाम प्रमुखता से सामने आया है। पकड़ी गई गाड़ियां इसी कंपनी की बताई जा रही हैं। चर्चा यह भी है कि कार्रवाई के दौरान एक तीसरा ट्रेलर भी मौके से हटाया गया, जिसे लेकर कई तरह की चर्चाएं तेज हैं। स्थानीय ट्रांसपोर्टरों और श्रमिकों के बीच यह बात आम है कि राख साइलो से लेकर डंपिंग स्थल तक हर स्तर पर “सेटिंग” का खेल चलता है और बिना संरक्षण के इतना बड़ा काम संभव नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी कंपनियों पर बार-बार आरोप लगने के बावजूद कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं होती? लोगों का कहना है कि कार्रवाई केवल दिखावे तक सीमित रहती है। कुछ दिन शोर होता है, फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। यही कारण है कि ठेकेदारों के हौसले लगातार बुलंद होते जा रहे हैं।
पूर्व में भी शंकर इंजीनियरिंग द्वारा कथित तौर पर इसी प्रकार की गंभीर लापरवाही और गड़बड़ी किए जाने के आरोप लगे थे। आरोप है कि राखड़ डैम निर्माण और कार्यों में अनियमितता के कारण झाभू बांध को नुकसान पहुंचा, जिसका खामियाजा आज पूरा विभाग भुगत रहा है। वर्तमान में CSPGCL के दो यूनिट बंद होने की चर्चा है, जिससे प्रतिदिन लगभग 5 करोड़ रुपये तक के नुकसान की बात कही जा रही है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि इस भारी नुकसान की जवाबदेही आखिर किसकी तय होगी? यदि ठेकेदारों की लापरवाही और कथित भ्रष्ट कार्यशैली के कारण सरकारी संपत्ति और उत्पादन प्रभावित हुआ है, तो उसकी भरपाई संबंधित ठेकेदारों से क्यों नहीं की जाती? जानकारों का मानना है कि जब तक आर्थिक वसूली और सख्त दंड की कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे मामलों पर रोक लगना मुश्किल है।
लोगों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि विभागीय अधिकारियों की कथित मिलीभगत के बिना इतना बड़ा खेल संभव नहीं हो सकता। यही वजह है कि हर बार जांच और कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति होती दिखाई देती है।
अब देखने वाली बात होगी कि हेम्स कॉरपोरेशन और पूर्व में विवादों में रहे शंकर इंजीनियरिंग जैसे मामलों में विभाग वास्तव में कोई ठोस कार्रवाई करता है या फिर एक बार फिर जांच और नोटिस की औपचारिकता निभाकर पूरे मामले पर पर्दा डाल दिया जाएगा।















