The Duniyadari: Bilaspur– छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण के मामलों में पत्नी अपने वर्तमान निवास स्थान की फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर सकती है। केवल इस आधार पर कि उसका स्थायी पता किसी अन्य जिले में है, अदालत के अधिकार क्षेत्र पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
यह फैसला न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने सारंगढ़-बिलाईगढ़ निवासी एक चिकित्सक द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए दिया। चिकित्सक ने अपनी पत्नी और दो नाबालिग बेटियों की ओर से बिलासपुर फैमिली कोर्ट में दाखिल भरण-पोषण याचिका की सुनवाई पर आपत्ति जताई थी
प्रकरण के अनुसार, वर्ष 2019 में विवाह के बाद दंपती के यहां दो बेटियों का जन्म हुआ। पत्नी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 144 के तहत बिलासपुर फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण की मांग करते हुए आवेदन प्रस्तुत किया। महिला ने पति और ससुराल पक्ष पर दहेज प्रताड़ना के आरोप लगाए तथा पति के कथित अवैध संबंधों का भी उल्लेख किया।
पति की ओर से दलील दी गई कि विवाह सारंगढ़ में हुआ था और पत्नी का मायका भी वहीं है, इसलिए बिलासपुर की अदालत को मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है। उसने यह भी कहा कि वह शारीरिक रूप से दिव्यांग है और उसे परेशान करने की नीयत से बिलासपुर में मामला दर्ज कराया गया है।
वहीं पत्नी ने अदालत को बताया कि वह वर्तमान में बिलासपुर जिले के लगरा क्षेत्र में किराये के मकान में रह रही है। इसके समर्थन में उसने आवश्यक दस्तावेज भी पेश किए। हाईकोर्ट ने दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद माना कि महिला वास्तव में बिलासपुर में निवास कर रही है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि कोई महिला किसी स्थान पर वास्तविक रूप से निवास कर रही है, तो उसे वहां की सक्षम फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण का दावा प्रस्तुत करने का अधिकार है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने चिकित्सक की याचिका खारिज कर दी और बिलासपुर फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को सही ठहराया।















