Sunday, July 5, 2026
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‘सिर्फ साथ दिखना हत्या का सबूत नहीं’, हाईकोर्ट ने उम्रकैद रद्द कर आरोपी को किया बरी

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The Duniyadari: Bilaspur– छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हत्या के मामलों में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की अहमियत पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल ‘लास्ट सीन थ्योरी’ के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला बिना किसी संदेह के आरोपी की संलिप्तता साबित नहीं करती, तब तक दोषसिद्धि कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकती।

इसी सिद्धांत को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने रायपुर जिले के सिलतरा में वर्ष 2016 में हुई हत्या के मामले में आरोपी बेनीराम उर्फ छोटू बघेल को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। इसके साथ ही निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा भी निरस्त कर दी गई।

मामले के अनुसार, 21 अप्रैल 2016 की रात मृतक रहमुद्दीन उर्फ मोनू और आरोपी बेनीराम को एक साथ शराब पीते देखा गया था। अभियोजन का आरोप था कि दोनों के बीच विवाद होने पर आरोपी ने पत्थर से हमला कर रहमुद्दीन की हत्या कर दी। जांच के दौरान पुलिस ने आरोपी के कथित मेमोरेंडम के आधार पर घटना में प्रयुक्त पत्थर भी बरामद किया था। हालांकि पूरे मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह मौजूद नहीं था और अभियोजन पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर निर्भर था।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि जिस गवाह के बयान के आधार पर ‘लास्ट सीन’ का दावा किया गया था, वह अदालत में अपने पहले के बयान से मुकर गया। ऐसे में अभियोजन का सबसे महत्वपूर्ण आधार ही कमजोर पड़ गया और आरोपी के खिलाफ साक्ष्यों की श्रृंखला अधूरी रह गई।

अपने फैसले में अदालत ने कहा कि केवल यह तथ्य कि आरोपी और मृतक को घटना से पहले साथ देखा गया था, हत्या साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। आपराधिक मामलों में अभियोजन को हर संदेह से परे अपराध सिद्ध करना होता है और यदि ऐसा नहीं हो पाता, तो आरोपी को संदेह का लाभ मिलना कानून का मूल सिद्धांत है।

 

कानूनी जानकारों के अनुसार, यह फैसला उन सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल है जो केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित हैं। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि ‘लास्ट सीन थ्योरी’ तभी प्रभावी मानी जाएगी, जब उसे मजबूत और विश्वसनीय साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला का समर्थन प्राप्त हो।