Thursday, June 11, 2026
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अंतरधार्मिक विवाह पर हाईकोर्ट सख्त, कहा- बालिगों की पसंद में दखल बर्दाश्त नहीं

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The Duniyadari: Bilaspur– छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अंतरधार्मिक विवाह करने वाले दंपती को महत्वपूर्ण राहत देते हुए स्पष्ट किया है कि दो बालिग व्यक्तियों को अपनी इच्छा से जीवनसाथी चुनने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। अदालत ने कहा कि किसी भी परिवार या समाज को ऐसे वैवाहिक निर्णयों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है और राज्य का दायित्व है कि वह ऐसे दंपतियों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने अंबिकापुर निवासी मोहम्मद जीशान और आन्या सोनी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। दोनों ने अलग-अलग धर्मों से होने के बावजूद आपसी सहमति से विवाह किया था, लेकिन परिवारों के विरोध और कथित धमकियों के चलते उन्हें न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।

याचिका में दंपती ने बताया कि विवाह के बाद उन्हें लगातार प्रताड़ना और झूठे मामलों में फंसाने की धमकियां मिल रही थीं। साथ ही उन्हें सम्मान के नाम पर हिंसा की आशंका भी थी। पुलिस से सुरक्षा की मांग के बावजूद अपेक्षित सहायता नहीं मिलने पर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि धमकियों के आरोप पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें अपनी पसंद से विवाह करने की स्वतंत्रता भी शामिल है।

खंडपीठ ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह सामाजिक समरसता को बढ़ावा देते हैं और भेदभावपूर्ण सोच को कमजोर करने में सहायक होते हैं।

अदालत ने संबंधित पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि दंपती की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और भविष्य में किसी भी शिकायत पर तत्काल कार्रवाई की जाए। साथ ही परिजनों को चेतावनी दी गई कि वे नवविवाहित जोड़े के वैवाहिक जीवन में किसी प्रकार का अवैध हस्तक्षेप न करें। न्यायालय ने दो टूक कहा कि विवाह को लेकर असहमति अलग बात है, लेकिन धमकी, उत्पीड़न या हिंसा किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकती।