चार बहनों का अधूरा बचपन तूफान ने छीना मां का सहारा, राहत राशि के लिए अब भी दर-दर भटक रहीं अनाथ बेटियां

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The Duniyadari: कोरबा – यह कहानी सिर्फ एक हादसे की नहीं, बल्कि उस इंतजार की है जो वर्षों से खत्म नहीं हुआ। सीतामढ़ी की चार बहनों की जिंदगी बचपन से ही संघर्षों से घिरी रही। पहले पिता का निधन हुआ, फिर मां ने मजदूरी कर जैसे-तैसे घर संभाला।

साल 2018 में आए भीषण आंधी-तूफान ने परिवार की आखिरी उम्मीद भी छीन ली। कच्चे मकान का एक हिस्सा गिरने से मां की मौके पर ही मौत हो गई। उस हादसे के बाद सिम्मी, स्नेहा, मुस्कान और आस्था पूरी तरह अनाथ हो गईं। कम उम्र में ही उनके कंधों पर जिंदगी की कठोर जिम्मेदारियां आ गईं।

रोटी और पढ़ाई के बीच जंग

माता-पिता के साए के बिना चारों बहनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती दो वक्त की रोटी और पढ़ाई जारी रखने की रही। रिश्तेदारों और आसपास के लोगों की मदद से गुजारा तो हो रहा है, लेकिन भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। स्कूल की पढ़ाई से ज्यादा चिंता अब रोजमर्रा की जरूरतों की हो गई है।

राहत राशि अब तक अधर में

बहनों का कहना है कि प्राकृतिक आपदा में मां की मौत के बाद मिलने वाली सरकारी सहायता के लिए उन्होंने कानूनी प्रक्रिया भी पूरी की। बावजूद इसके, वर्षों तक फाइल आगे नहीं बढ़ सकी। समय गुजरता गया, मगर मदद सिर्फ आश्वासनों तक सीमित रही।

हाल ही में चारों बहनों ने कलेक्टर कुणाल दुदावत से मिलकर अपनी परेशानी बताई। कलेक्टर ने मामले को गंभीर बताते हुए संबंधित एसडीएम को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। प्रशासनिक स्तर पर प्रक्रिया फिर से शुरू हुई है, लेकिन बहनों को अब भी ठोस सहायता का इंतजार है।

संवेदना और जिम्मेदारी का सवाल

यह मामला सिर्फ आर्थिक मदद का नहीं, बल्कि उन बच्चों के भविष्य का है जिनके सिर से माता-पिता का साया उठ चुका है। सवाल यह है कि क्या व्यवस्था की गति इतनी तेज होगी कि इन बहनों की उम्मीदें टूटने से पहले उन्हें सहारा मिल सके। अब सबकी निगाहें प्रशासनिक कार्रवाई और उसके परिणाम पर टिकी हैं।