The Duniyadari: जगदलपुर। झीरम घाटी हत्याकांड में एनआईए की विशेष अदालत द्वारा 10 दोषियों को मृत्युदंड दिए जाने के बाद मामले को लेकर आदिवासी समाज की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। समाज के प्रतिनिधियों और प्रभावित परिवारों की जगदलपुर के परपा में बैठक हुई, जिसमें बस्तर संभाग सहित आसपास के करीब 6-7 जिलों से लोग शामिल हुए।
बैठक में कुछ प्रभावित परिवारों और समाज के प्रतिनिधियों ने अदालत के फैसले पर असहमति जताई। उनका दावा है कि जिन लोगों को इस मामले में दोषी ठहराया गया है, वे झीरम की घटना में शामिल नहीं थे। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में होने वाली बैठकों में किसी ग्रामीण की मौजूदगी को नक्सली गतिविधि में भागीदारी का आधार नहीं माना जाना चाहिए।
कानूनी लड़ाई के लिए गांव-गांव से जुटाया जाएगा सहयोग
बैठक में मामले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की रणनीति पर भी चर्चा हुई। समाज की ओर से कहा गया कि प्रभावित परिवारों के साथ मिलकर आगे कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी। इसके लिए गांवों और परिवारों से आर्थिक सहयोग जुटाने का निर्णय लिया गया है। प्रत्येक परिवार से 20 रुपये सहयोग राशि लेने की बात कही गई है।
समाज के प्रतिनिधियों के मुताबिक, पहले हाईकोर्ट में अपील दाखिल की जाएगी। वहां से राहत नहीं मिलने की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट तक मामला ले जाने की तैयारी है।
प्रकाश ठाकुर बोले- फैसले से समाज संतुष्ट नहीं
सर्व आदिवासी समाज के संभागीय अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने बैठक के बाद कहा कि प्रभावित परिवारों से चर्चा के दौरान कई सवाल सामने आए हैं। उनके अनुसार, समाज एनआईए कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं है।
ठाकुर का दावा है कि जेल में बंद कुछ लोग घटना में शामिल नहीं थे और उन्हें नक्सली गतिविधियों से जोड़ना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर होने वाली बैठकों में ग्रामीणों की भागीदारी सामान्य बात है। उनके मुताबिक, केवल बैठक में शामिल होने से किसी व्यक्ति को नक्सली गतिविधियों से जुड़ा हुआ नहीं माना जा सकता।
उन्होंने कहा कि समाज अब फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहा है और जरूरत पड़ने पर आगे सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई जारी रखी जाएगी।
गंगा नाग ने भी उठाए सवाल
सर्व आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष गंगा नाग ने कहा कि प्रभावित परिवारों से चर्चा के बाद समाज ने इस मामले में कानूनी लड़ाई आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। उनका दावा है कि सजा पाने वाले लोगों की भूमिका को लेकर समाज के सामने कई सवाल हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि झीरम हमले के पीछे जिन लोगों को वास्तविक रूप से जिम्मेदार माना जा रहा है, उनमें से कई आज भी बाहर हैं, जबकि कुछ अन्य लोग जेल में बंद हैं। इसी मुद्दे को लेकर समाज अब न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण में अपना पक्ष रखने की तैयारी कर रहा है।
झीरम घाटी मामले में 13 साल बाद 16 सितंबर 2026 को जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत ने 10 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया था। अदालत के इस फैसले के बाद अब प्रभावित परिवारों और आदिवासी समाज के एक वर्ग की ओर से हाईकोर्ट में अपील की तैयारी की बात सामने आई है।



















