Wednesday, September 30, 2026
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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: आदिवासी महिला बिना परंपरा त्यागे पैतृक संपत्ति में नहीं मांग सकती हक

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The Duniyadari : बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में यह साफ किया है कि अनुसूचित जनजाति समाज की महिला केवल हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के आधार पर पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं जता सकती। ऐसा तभी संभव होगा, जब यह ठोस रूप से साबित किया जाए कि संबंधित जनजाति ने अपनी पारंपरिक उत्तराधिकार व्यवस्था को त्याग दिया है।

न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की एकलपीठ ने आशावती बनाम रुखमणी व अन्य प्रकरण में 41 वर्ष पुराने नामांतरण और बंटवारे को चुनौती देने वाली अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा।

मामले में अपीलकर्ता आशावती ने सिविल कोर्ट में यह दावा किया था कि उनके पिता स्वर्गीय धरमसिंह बरीहा की दो शादियां थीं और वे दूसरी पत्नी की पुत्री हैं। उन्होंने 83 एकड़ से अधिक पैतृक कृषि भूमि में समान हिस्से की मांग की थी। आशावती का आरोप था कि वर्ष 1971-72 में राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से उनका नाम रिकॉर्ड से हटा दिया गया, उस समय वे नाबालिग थीं, न तो उन्हें कोई सूचना दी गई और न ही उनकी सहमति ली गई, इसलिए नामांतरण व बंटवारा अवैध है।

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान माना कि सभी पक्षकार बिंझवार अनुसूचित जनजाति से संबंधित हैं, जिस पर सामान्य रूप से हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू नहीं होता। कोर्ट ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता यह प्रमाणित नहीं कर सकीं कि उनकी जनजाति ने पारंपरिक उत्तराधिकार नियमों को छोड़ दिया है। इस संदर्भ में अदालत ने बुटाकी बाई बनाम सुखबती बाई (2014) के फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि आदिवासी पुत्री केवल हिंदू कानून के आधार पर पैतृक संपत्ति का दावा नहीं कर सकती।

अदालत ने समय-सीमा के पहलू पर भी कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि वर्ष 1972 में पारित और प्रमाणित नामांतरण आदेश को वर्ष 2013 में चुनौती देना कानूनन स्वीकार्य नहीं है। इतने लंबे समय तक आपत्ति न उठाना दावे को समय-सीमा से बाहर कर देता है। साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दशकों तक लागू रहे राजस्व रिकॉर्ड को बिना ठोस धोखाधड़ी के प्रमाण के खारिज नहीं किया जा सकता।