कहते हैं राजनीति जैसी दिखती है वैसी होती नहीं उसे दूर बैठकर शतरंज के खिलाड़ी की तरह समझना पड़ता है कुछ उसी तरीके कि स्थिति इन दिनों महाराष्ट्र की बनी हुई है महाराष्ट्र की राजनीति में साफ दिखाई दे रहा है कि शिवसेना का एक धड़ा नाराज होकर बीजेपी के समर्थन से सरकार बना सकता है इसमें बीजेपी की तोड़फोड़ वाली राजनीति भी जिम्मेदार कही जा रही है,,,, पर क्या वाकई ये सही हो सकता है? कि एक ऐसा दल जहां निष्ठा कट्टरता की हद तक है वहां के 56 में से 40 विधायक गायब हो गए और अब वह सरकार गिराने जा रहे हैं?? इस पर संशय है
अब समझते हैं इस उथल-पुथल का कारण क्या है?? शिवसेना के विधायकों की यह बेचैनी विपक्षी दल भाजपा के मनी और मसल्स पावर के दबाव से ज्यादा अस्तित्व के संकट की वजह से है दरअसल शिव सेना को अपने कभी विरोधी दल रहे पार्टियों के साथ सत्ता में आते ही
विचारधारा
विधानसभा क्षेत्र
और राजनैतिक अस्तिव ,,तीनो खतरे में आ गए थे,,
सरकार में आते ही शिवसेना की विचारधारा एक बक्से में बंद हो गई ऐसे में हिंदुत्व और भगवा की राजनीति का लाभ बीजेपी के साथ उनके ही परिवारिक सदस्य राज ठाकरे उठाने लगे थे जिससे विचारधारा के हाथ से निकल जाने के साथ एक नई प्रतिस्पर्धी को बेवजह फायदा मिल रहा था
इसके अलावा गठबंधन में आते ही शिवसेना के विधायकों के विधानसभा क्षेत्र और राजनीतिक अस्तित्व पर संकट गहराता दिख रहा था क्योंकि शिवसेना के 56 विधायकों ने जिन सीटों से विजयश्री हासिल की उसमें से 22 सीट कांग्रेस के उम्मीदवार को हराकर जीती है तो करीब 26 सीटें एनसीपी के उम्मीदवार को हराकर जीती गई हैं इस तरीके से 56 में से कुल 48 सीटों में शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी को हराकर विधायक बनाने में कामयाब हुई है और अब उन्हीं दलों के साथ उसका गठबंधन है ऐसे में यह 48 विधायक अपने क्षेत्र में लगातार असहज महसूस कर रहे थे और कांग्रेस एनसीपी गठबंधन वाली सरकार के उपलब्धि को शिवसेना के विधायकों के क्षेत्र में कांग्रेस और एनसीपी जब लेकर जा रही थी तो एक अंदरूनी प्रतिस्पर्धा क्षेत्रों में बन गई थी
वही वैचारिक रूप से जिस भगवे झंडे के अंतर्गत शिवसेना राजनीति करती है उसे वह राजनीति करने का मौका गठबंधन सरकार में नहीं मिला जिसका फायदा बीजेपी ने खूब उठाया और शिवसेना को हिंदुत्व से दूर होने का तमगा मिल गया,,, गठनबधन धर्म के तहत मुख्यमंत्री का पद शिवसेना को जब से मिला तब से शिवसेना ने अपने विधायकों से ज्यादा गठनबधन सहयोगी कांग्रेस और एनसीपी विधायकों को तो दिया जिससे शिवसेना विधायकों में एक अंदरूनी असंतोष की छाया भी थी,, और जब यह तीनों चीजें मिली तो शिवसेना विधायकों को अपने अस्तित्व पर संकट नजर आने लगा और इस संकट से बचने के लिए बीजेपी के मजबूत सहारे के साथ शिवसेना में बगावत का बिगुल फूंका गया और नतीजा सबके सामने हैं लेकिन इस बात से इनकार नही किया जा सकता कि इन बातों से ठाकरे परिवार अनजान होगा,,ऊपर बताई गई तीनों प्रमुख वजह को हवाओ राज ठाकरे नामक खतरे ने दी ठाकरे परिवार का तेजतर्रार वह नेता जो पिछले 20 सालों से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है उसे गठबंधन सरकार की वजह से अचानक विचारधारा राजनीतिक स्पेस और बीजेपी जैसे पीछे से मदद करने वाला मिल गया था,,,ऐसे में अस्तित्व के संकट से शिवसेना के विधायक ही नहीं शिवसेना से प्रमुख भी जूझ रहे थे शिवसेना की स्थापना करते वक्त बालासाहेब ठाकरे ने जो ठाकरे परिवार की एक छवि बनाई थी वह उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री काल में पूरी तरह से धूमिल होती दिखी थी कांग्रेस और एनसीपी की जुड़ी इनकंबेंसी हो,,,,, वैचारिक विचारधारा हो सब का ठीकरा ठाकरे परिवार पर फूटने वाला था आने वाले विधानसभा चुनाव में इन सब बातों के भार के साथ विधायकों की बात तो छोड़िए ठाकरे परिवार महाराष्ट्र की जनता का सामना कर पाता इस पर संशय बना हुआ है,,, ऐसे में गठबंधन तोड़कर बनाई गई सरकार से गठबंधन तोड़ कर फिर पुराने गठबंधन साथी भाजपा के साथ चाह कर भी उद्धव ठाकरे नहीं जा सकते थे इस तरह का कदम ठाकरे परिवार और पार्टी दोनों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता था शिवसेना अकेले लड़ने का खामियाजा एक बार भुगत चुकी है और फिर गठबंधन तोड़ के दूसरे गठबंधन में जाने से परिणाम और घातक हो सकते थे इसलिए ठाकरे परिवार इस गठबंधन के बंधन से,, छुटकारे के लिए 🐉 सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे के प्लान पर चलती हुई दिखाई दे रही है एकनाथ शिंदे और ठाकरे परिवार से बगावत को मैग्नीफाइंग ग्लास से देखने की जरूरत है इस मे कोई छुपा हुआ हिडन लान भी हो सकता है,,,,!!!!!! क्योंकि शिवसेना खींचतान कर 5 साल की सरकार तो चला सकती थी लेकिन 5 साल बाद के चुनाव में शिवसेना के अस्तित्व को एनसीपी कांग्रेस और भाजपा के साथ राज ठाकरे से ही खतरा हो जाता और ऐसे में शिवसेना फायदे में रहती इसकी संभावना नहीं के बराबर थी,,,,, शायद इसीलिए एकनाथ शिंदे ही नहीं बल्कि अपने परिवार सहित पूरी शिवसेना महा अगाड़ी सरकार छुटकारा पाना चाहती है
दरअसल इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के स्क्रिप्ट में एकनाथ शिंदे के साथ पार्टी सुप्रीमो की रजामंदी से इनकार नहीं किया जा सकता,,, तभी कट्टर शिवसैनिकों वाली इस पार्टी के विधायक इतनी दमदार इसे और इतनी बड़ी संख्या में ठाकरे परिवार के खिलाफ खड़े दिखाई दे रहे हैं अस्तित्व का संकट इन विधायकों के साथ ठाकरे परिवार पर भी है इस लिए मौका बन नही बनाया गया प्रतित हो रहा है एकनाथ शिंदे की बगावत को आधार बनाकर पूरी शिवसेना एनसीपी कांग्रेस गठबंधन से अपने आपको अलग कर सकती है यह सिचुएशन कुछ वैसे ही होगी जब 2019 में अजित पवार ने बगावत कर बीजेपी को समर्थन दे दिया था फिर बाद में वापस आकर सरकार में हम पद पर रहे कुछ उसी फार्मूले को शिवसेना अपना रही है ठीक ढाई साल राज करने के बाद ठाकरे की हसरत भी पूरी हो गई और अब आरोपों और पार्टी की छवि को ठीक करने फिर से ठाकरे हिंदुत्व की ओर वापसी करना चाहते हैं ऐसे में उसे पार्टी के नेताओं की बगावत का एक बड़ा सहारा मिल गया है,,
मोहन तिवारी की वाल से































